सवाल :- दिल्ली में हालात सामान्य करने में इतना वक्त क्यों

0
73
अगर दिल्ली में हुई हिंसा के बारे में कई खुफिया सूचनाएं थीं तो सही समय पर, सही संख्या में, सही जगह पर सुरक्षाबल तैनात क्यों नहीं किये गये?

23 और 26 फरवरी के बीच उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा की जो कहानियां सामने आ रही हैं, उससे एक सवाल दिमाग में बार-बार उठता है: प्रशासन ने – चाहे वो दिल्ली पुलिस हो या गृह मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय – जल्द से जल्द दंगा प्रभावित इलाकों में पहुंचकर शांति बहाल करने की कोशिश क्यों नहीं की?

मंगलवार देर रात हालात को काबू में करने की पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को सौंपी गई. तब तक सबकुछ दिल्ली पुलिस के हाथ में था, जो कि गृह मंत्री अमित शाह के अधीन है.

बुधवार की सुबह अजित डोभाल ने सुरक्षाबलों के साथ दिल्ली की गलियों का दौरा किया. उन्होंने लोगों को यकीन दिलाया कि ‘जो हुआ सो हुआ, अब वैसा कुछ नहीं होगा.’ उसी दिन पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने उन इलाकों में फ्लैग मार्च किया जहां रविवार रात से शुरू हुई हिंसा अगले दो दिनों तक लगातार जारी रही थी. तब तक, जैसा कि तमाम मीडिया रिपोर्ट्स और मरने वालों की हर दिन बढ़ती संख्या से जाहिर है, देश की राजधानी के कई इलाके बाहरी लोगों से कटे रहे. क्योंकि वहां तक पहुंचने वाली सड़कों पर हिंसक भीड़ का कब्जा था.

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मीडिया रिपोर्ट्स और हिंसा के वीडियो से साफ है कि पुलिस या तो बेपरवाह थी या फिर भीड़ को काबू करने में पूरी तरह असमर्थ. कई जगहों पर तो वह खुद ही हिंसा में शरीक नजर आई.

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘दंगा रोकने वाले साजो-सामान से लैस सैंकड़ों पुलिसकर्मी चुपचाप पत्थरबाजी और आगजनी देखते रहे, उन्होंने भीड़ को हटाने की कोई कोशिश नहीं की. भीड़ के मुकाबले कम तादाद में मौजूद ये पुलिस के जवान हाथ बांध कर खड़े रहे जबकि उपद्रवी मकानों और दुकानों में आग लगाते रहे.’

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक अन्य रिपोर्ट पूरे हालात को और बेहतर ढंग से बयां करती है:

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here