आत्मनिर्भर बनकर आदिवासियों ने पेश की मिसाल, एक ही दिन में बना डाला बांध

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दशकों से पानी की एक-एक बूंद को तरसने वाले आदिवासियों ने आत्मनिर्भर होने की मिसाल पेश की है. मासूम बच्चों ने भी बांध बनाने में अपने माता-पिता का साथ दिया. आदिवासियों ने एक ऐसे बांध का निर्माण किया है, जिसमें ठहरा पानी क्षेत्र के हजारों आदिवासियों और लाखों जंगली जानवरों की न सिर्फ प्यास बुझाएगा बल्कि रबी की फसल की पूरी खेती भी इस पानी से हो सकेगी. वर्षों से क्षेत्र में पानी की समस्या कुछ ऐसी थी कि पूरा गांव पलायन कर जाता था. ग्रामीणों ने पानी के लिए न सिर्फ डैम का सपना देखा बल्कि कड़ी मेहनत कर उसे बना भी डाला है.

चित्रकूट की तराई के पहुंच विहीन घने जंगल के बटोही गांव के वनवासी एक बार फिर से सुर्खियों में हैं. घने जंगलों में रहने वाले इन आदिवासियों ने अपनी दम पर भरी बरसात में झूरी नदी को रोककर अपने लिए बांध बनाया है. बारिश के बाद यही पानी जहां इन ग्रामीण किसानों के लिए रबी सीजन में सिंचाई के काम आएगा. वहीं, वन्य प्राणियों के साथ-साथ पालतू मवेशियों की भी प्यास बुझाएगा. यही नहीं, अगली बरसात तक पेयजल का संकट भी टल जाएगा. बांध में फिलहाल 3 फीट पानी का भराव है.

एक ही दिन में बन गया डैम

भरी बरसात में बहती नदी को रोककर कच्चे बांध का निर्माण यूं तो किसी सपने से कम नहीं है. मगर हैरतअंगेज है कि बटोही के तकरीबन आधा सैकड़ा वनवासियों ने महज एक ही दिन में झूरी नदी को रोककर कच्चा बांध तैयार कर लिया. बोरी बंधान के लिए बोरियां गोलकी देवी सामाजिक सेवा संस्थान के अध्यक्ष विष्णुगर्ग और सचिव मनीष पांडेय ने उपलब्ध कराईं. इस तरह से बाढ़ के बहाव में इतराती झूरी नदी की राह रुक गई. इस श्रमदान में गांव के बच्चों से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक ने अहम भूमिका निभाई.

आदिवासी महिला देवकली ने बताया कि हमने बांध इसलिए बनाया ताकि मवेशियों और खेती के लिए पानी मिल सके. अपने बच्चों के साथ यहां पत्थर लगा रहे हैं. हमने प्रधान और विधायक से एक नहीं बल्कि कई बार बोला कि यहां पानी की व्यवस्था करा दो मगर किसी ने कुछ नहीं कराया. जिसके बाद हमने खुद बांध बनाने का फैसला किया.
समाजसेवी अशोक मिश्रा ने कहा कि यह चित्रकूट नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक 13  के बटोही गांव में आजादी के बाद से ही पीने के पानी की दिक्कत है. पानी की किल्लत के कारण आदिवासी गांव छोड़कर चले जाते थे. हम लोगों ने सोचा कि एक डैम बनाते हैं जिसके बाद हमने बोरियों और प्लास्टिक की मदद से बांध बनाया. इससे इनके 5 महीने के पानी का इंतजाम हो गया है. मवेशियों के लिए भी पानी का इंतजाम हो गया.

 

समाजसेवी मनीष पांडेय ने कहा कि एक साल पहले तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने स्कूल और बिजली की व्यवस्था तो कर दी थी मगर यहां पानी की समस्या अब भी थी. इनको आत्मनिर्भर बनाने के लिए बांध का काम किया गया है. आदिवासी परिवारों ने अपने बच्चों के साथ-साथ बड़े उत्साह के साथ इस कार्यक्रम में भाग लिया और पूरा बांध बनकर तैयार हो गया. अब इनके लिए पानी होगा क्योंकि पहले इनको पानी के लिए 3-4 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. इसी चक्कर में कई परिवार पलायन कर गए.

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