योगी से मुकाबले के लिए मायावती की सोशल इंजीनियरिंग, ब्राह्मण-दलित गठजोड़ पर जोर

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बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की चीफ मायावती 8 साल से यूपी की सत्ता से बाहर हैं. 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने दलित और ब्राह्मणों के सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से सत्ता में वापसी की थी, लेकिन इसके बाद उनका चुनावी दांव नहीं चला. अब मायावती एकबार फिर दलित और ब्राह्मणों के अपने पुराने गठजोड़ पर भरोसा करती दिख रही हैं. मायावती ने परशुराम को राजनीति के अखाड़े में लाकर ये साफ कर दिया है.

मायावती के मुताबिक, 2022 में अगर उनकी सरकार बनी तो वो परशुराम भगवान की मूर्ति लगवाएगी. अस्पताल और पार्कों का नाम भी उनके नाम पर रखा जाएगा. वहीं परशुराम की मूर्ति बनाने का एक वादा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी किया है. मायावती, अखिलेश पर बरस रही हैं.

बीएसपी सुप्रीमो एक हाथ से ब्राह्मणों को साध रही हैं तो दूसरे हाथ से दलितों में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश करती दिख रही हैं. उन्होंने राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान दलितों को सम्मान ना मिलने का दांव चला.

उन्होंने कहा कि पांच अगस्त को जब प्रधानमंत्री ने राम मंदिर का शिलान्यास किया तो अच्छा होता अगर वो उस समय दलित समाज से जुड़े देश के राष्ट्रपति को भी साथ में ले जाते. कुछ दलित संत भी चिल्लाते रहे कि हमें नहीं बुलाया गया. उनको नहीं बुलाया पर राष्ट्रपति को बुला लेते तो अच्छा संदेश जाता.

2007 में ब्राह्मणों और दलितों के गठजोड़ के साथ आखिरी बार सत्ता में काबिज होने वालीं मायावती अब एक फिर अपने परखे हुए चुनावी गणित की बिसात बिछाते हुए देखी जा रही हैं. हालांकि दलितों ने 2012 में मायावती को नकार दिया. 2014 लोकसभा चुनाव में भी भाव नहीं दिया और 2017 में भी उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ.

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती को अपने दलित वोट बैंक पर हद से ज्यादा भरोसा रहा, लेकिन ब्राह्मणों का मायावती से मोहभंग हो चुका था. इसकी काट निकालने के लिए मायावती को दलित और मुस्लिम समुदाय के सपोर्ट की पूरी उम्मीद थी, लेकिन सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया. वो सत्ता में वापसी नहीं कर पाईं.

अब वो एक बार फिर दलित और ब्राह्मणों गठजोड़ को साधने की कोशिश कर रही हैं. उधर बीजेपी ने बीएसपी और एसपी पर निशाना साधते हुए कहा कि जयश्री राम का विरोध करने वाले अब परशुराम के नाम पर सत्ता हासिल करने का ख्वाब ना देखें.

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